दीनबंधु डॉ. श्यामादत्त पाण्डेय

साहित्य किसी भी समाज की आत्मा होता है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं, अनुभवों और सामाजिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज होता है।

साहित्य

स्वर्गीय श्री कपिलदेव पाण्डेय, बभनौलिया

11/1/19991 min read

हे बंधन वंश के गौरव, तुम विप्र वंश के उजागर सितारे थे। दानी, सम्मानी और मानवता के परम पुजारी थे।

जीवन परिचय
आपका जन्म बंधन वंश में हुआ था, जो विप्र वंश में उदार, दानी और सपूतों का वंश रहा है। आपका जन्म बभनौलिया गाँव के पंडित शिव दास पाण्डेय के यहाँ 10 नवंबर 1924 को हुआ। उस समय यह गाँव प्लेग की महामारी से बचने के लिए गाँव से बाहर झोपड़ियों में निवास कर रहा था। उसी संकट की अवस्था में आपका जन्म झोपड़ी में हुआ। आप जन्मजात से ही 'होनहार वीर' प्रतीत होते थे। आपकी माता साध्वी, उदार और साक्षात गृहलक्ष्मी थीं। आपके जन्म के अवसर पर मंगलाचार और दान-दक्षिणा का वितरण कर घर (झोपड़ियों) को विभूषित किया गया।

बाल्यावस्था
आप सभी वर्गों के बच्चों के साथ समान रूप से खेलते और भोजन करते थे। माता-पिता जो भी खाने-पीने का सामान आपको देते थे, आप उसे बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों में बांट देते थे। इन बातों को आप अपनी माता से छुपाते थे। विद्यालय में भी आप यह जानने का प्रयास करते थे कि किस बच्चे के पास किताब नहीं है, और उसे अपनी किताब दे देते थे। जब आपकी माता ने इस बात को जान लिया, तो उन्होंने कहा, "बेटा, कभी झूठ मत बोलना। यदि तुम किसी को कुछ देना चाहते हो, तो मुझसे सच कहो। मैं वह सामान प्रसन्नता से दूँगी। भगवान करे तुम उदार बनो।"

शरारतें
बचपन में भी आपको नकली पान खाने का शौक था। एक बार आपने अपने साथी शिवहर पाण्डेय के साथ पीपल के पत्ते में दूध, ईंट की बुकनी और धतूरा के बीज मिलाकर पान बनाया और दोनों ने खाया। आपने अपनी तीव्र बुद्धि के कारण उसे तुरंत उगल दिया, लेकिन आपका साथी ध्यान न देकर उसे निगल गया, जिससे वह बेहोश हो गया। आपके बताने पर तत्काल औषधोपचार किया गया और उसे स्वस्थ किया गया।

संस्कार
आपने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बिहार राज्य में अपने नाना के यहाँ प्राप्त की। आपके नाना उदार, दानी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। वे गरीब छात्रों और सभी रिश्तेदारों की सहायता अपने परिवार से छिपाकर करते थे। उनके इन्हीं संस्कारों का प्रभाव आप पर भी पड़ा। इसके बाद आपने दरभंगा के चिकित्सा शिक्षालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बिहार के रंका चिकित्सा संस्थान में सर्जन के पद पर आसीन हुए।

सार्वजनिक सेवा
जब भी आप नौकरी से अवकाश पर आते थे, तो आपके परम स्नेही पंडित कपिलदेव पाण्डेय गाँव में शिक्षा के अभाव को देखकर आपसे एक प्राइमरी विद्यालय बनाने का आग्रह करते थे। यह आग्रह आपको सत्य और प्रासंगिक लगा। आपने 26 जनवरी 1948 को प्राइमरी विद्यालय भवन के निर्माण की नींव रखी। बड़े उत्साह और उल्लास के साथ शिलान्यास किया गया। आज भी यह विद्यालय प्रति वर्ष 26 जनवरी को उसी उत्साह और उल्लास के साथ समारोह मनाता है, और आपकी अनुपस्थिति में आँखों में आँसू लेकर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

इसी संदर्भ में, आपने 26 जनवरी 1950 को अपने निजी मकान में 'नेहरू पुस्तकालय' की स्थापना की और गाँव में शिक्षा तथा संस्कृति का एक नया जागरण शुरू किया। उसी दिन प्रधान बभनौलिया द्वारा श्रमदान से निर्मित चार सड़कों का उद्घाटन भी किया गया।

नौकरी से त्याग पत्र
“रंका चिकित्सा संस्थान” में मानवता की सच्ची सेवा में तल्लीन रहने के कारण, आपने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और दिलदारनगर बाजार में अपना निजी 'सेवा सदन' स्थापित किया, जहाँ गरीबों, अपाहिजों और असहायों की तन, मन, धन से सेवा शुरू कर दी।

दानशीलता
एक बार, जब लेखक आपके साथ चिकित्सालय में बैठा था, तभी एक लगभग 12 वर्ष का लड़का, जो नंगे पांव और नंगे बदन था, आपके सामने खड़ा होकर रोने लगा। उसकी करुण रुलाई को देखकर आप फूट-फूट कर रोने लगे। उसकी सच्ची कहानी सुनने के बाद, आप स्वयं बाजार गए और उसके लिए कपड़े, किताबें खरीदीं और उसे विद्यालय में प्रवेश दिलाया। आज वही मुसहर जाति का बच्चा मैट्रिक पास कर प्राइमरी विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्यरत है।

'न हिन्दू न मुसलमान, बस मुकम्मल इंसान'

आप अपने दिल के दर्द को कभी ज़ाहिर नहीं होने देते थे। किसी ने कभी आपको उदास नहीं पाया। कितने ही सदमे लगे आपको। वे सदमे पारिवारिक कम और सामाजिक अधिक थे। समाज में हर किस्म के व्यक्ति होते हैं। आप की लोकप्रियता ने कई लोगों को ईर्ष्यालु बना दिया था।परन्तु आप उनकी ओछी आलोचना और टीका-टिप्पणी को हमेशा नज़र अंदाज़ कर जाते थे, बल्कि दुनिया के सामने आपने सदा मधुरमुस्कान ही बिखेरी।

ज़िन्दगी इक आँसुओं का जाम है, पी गए कुछ और कुछ छलका गए।

काश, पाण्डेय जी आज हमारे बीच होते! वर्तमान संदर्भ में पाण्डेय जी की उपादेयता का वास्तविक महत्व है।
वास्तव में इंसान जीना अब तक सीख नहीं पाया। जैसे-जैसे हमारी सभ्यता 'प्रौढ़' होती जा रही है, हम और अधिक आदिम युग की ओर बढ़ते नज़र आ रहे हैं।

पाण्डेय जी पहले देश और समाज का हित सोचते थे। इसके बाद ही अपना हित आपके सामने था। देश और समाज की मर्यादा का ध्यान रखना आप अपना पुनीत कर्तव्य समझते थे

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